Wednesday, July 4, 2007

मृग मरिचीका (पार्ट १ ऑफ़ ३)

ममता का आवेग उसके भीतर हिलोरे ले रहा था , जिसके फलस्वरूप वह सातवें आसमान पर विचर रही थी। अपने बेटे अभिनव एवम बहू अदा के पास वह पहली बार अमेरिका आ रही थी। बहू के नौंवा महीना चल रहा था। कभी भी डिलीवरी हो सकती थी। हमारे इंडिया में तो लिंग टेस्ट करवाना निषेध v, लेकिन इन्होंने तो यहां होते हुए भी टेस्ट नहीं करवाया था। कहते हैं कि पहला बेबी है , कुछ भी चलेगा। आप दादा -दादी बन रहे हैं और हम माँ -बाप। फिर भी नीरु के मन में एक हसरत जन्म ले रही थी ।
काश! पुत्र हो जाए। फिर सोचा ,क्या उसकी सोच ठीक है ?उसने तो कभी बेटे -बेटी में फर्क नहीं समझा था। वह एक नए जमाने की स्त्री थी। तो क्या वह अतीत में चली गयी है ?अपनी बिन सिर -पैर की सोच पर उसे हंसी आ गयी। अपनी सास व माँ की उम्र की होते ही उसकी सोच भी वैसे ही चलने लगी थी शायद ! तभी तो वह भी मंगलवार को सिर धोने का साहस नहीं कर पाती, वृहस्पतिवार को घर में कपडे नहीं धुलने देती, व शनीवार को घर में - घी- तेल नहीं ला ने देती थी। अभिनव के पापा इन बातों को पसंद नहीं करते थे। वह कहते कि पुराने लोगों की बातें उनके साथ खतम हो गयी हैं, आप अपनी सोच को बदल लो। लेकिन पढ़ लिखकर भी हमारी जडों में रूदिवादिता भरी ही है। पीढ़ी दर पीढ़ी कई बातें हमें घुट्टी में पिला दीं जाती हैं शायद !तभी तो बहु के लिए देसी घी की पंजीरी बनाकर नीरु साथ लाई थी। न मालूम आज की मॉडर्न बहू खाए या न खाए --लेकिन हमारे यहां डिलीवरी के बाद चालीस दिनों तक हर सुबह दूध के साथ पंजीरी खाई जाती है। देखें इन मान्यताओं को कितना मान मिल पता है अमेरिका में रहते बच्चों से ?खैर ,इसी ऊहा -पोह व विचारों की कडियों ने नीरु को सफर का पता ही नहीं चलने दिया ,वह लास- एंजिलिस पहुंचकर भी तरो- ताज़ा दिख रही थी।
दूर से अभिनव को अपनी ओर आते देखकर माँ का चेहरा खिल उठा। उसे गले लगाते ही मानो सफर के चौबीस घंटे हवा में उड़ गये। माँ की आँखें छलछला आईं। ममता की पैनी नज़र ने भांप लिया कि दोनो थके- थके से लग रहे थे। अपने देश में तो ऐसे हाल में बहुएँ नखरे करती हैं कि काम नहीं होता , चला नहीं जाता। लेकिन बाहर वे नौकरी के साथ -साथ घर का भी पूरा काम स्वयम करती हैं।
माँ के आजाने से उन दोनों को राहत मिली व घर का एकाकीपन भी दूर हुआ। नीरु के भीतर भी ममत्व का सागर उमड़ रहा था। वह बहू को हर तरह का आराम देने का प्रयत्न करती। अदा ने भी प्रसन्नचित्त हो माँ को बेबी नर्सरी दिखाई। जिसमें चार रंगों की सजावट थी। उसने बताया कि इसे 'रेइज़्ल -देज़ल'थीम कहते हैं। वैसे लडकी के होनेपर पिंक और लडके के होने पर ब्लू नर्सरी सजायी जाती है। बच्चा होने के पहले कोई दोस्त या रिश्तेदार 'बेबी- शावर 'या पार्टी देकर सब को बुलाकर बच्चे का सामान गिफ्ट करते हैं। इस सामान की लिस्ट रजिस्टर की जाती है। निमन्त्रण -पत्र पर स्टोर के नाम व सामान की लिस्ट उनकी कीमत के अनुसार दे दीं जाती है। जिस दोस्त ने जितनी कीमत का सामान उपहार में देना है, वे वहाँ से ले लेते हैं। ये स्टोर बच्चा होने पर उसी के अनुरूप सामान बदल भी देते हैं। नीरू को ये सब बातें दिलचस्प लगीं। 'बेबी शावर ' उसे गोद भराई के समानान्तर ही लगा।