Friday, July 6, 2007

मृग मरीचिका

का आवेग उसके भीतर हिलोरे ले रहा था , जिसके फलस्वरूप वह सातवें आसमान पर विचर रही थी। अपने बेटे अभिनव एवम बहू अदा के पास वह पहली बार अमेरिका आ रही थी। बहू के नौंवा महीना चल रहा था। कभी भी डिलीवरी हो सकती थी। हमारे इंडिया में तो लिंग टेस्ट करवाना निषेध v, लेकिन इन्होंने तो यहां होते हुए भी टेस्ट नहीं करवाया था। कहते हैं कि पहला बेबी है , कुछ भी चलेगा। आप दादा -दादी बन रहे हैं और हम माँ -बाप। फिर भी नीरु के मन में एक हसरत जन्म ले रही थी । काश! पुत्र हो जाए। फिर सोचा ,क्या उसकी सोच ठीक है ?उसने तो कभी बेटे -बेटी में फर्क नहीं समझा था। वह एक नए जमाने की स्त्री थी। तो क्या वह अतीत में चली गयी है ?अपनी बिन सिर -पैर की सोच पर उसे हंसी आ गयी। अपनी सास व माँ की उम्र की होते ही उसकी सोच भी वैसे ही चलने लगी थी शायद ! तभी तो वह भी मंगलवार को सिर धोने का साहस नहीं कर पाती, वृहस्पतिवार को घर में कपडे नहीं धुलने देती, व शनीवार को घर में - घी- तेल नहीं ला ने देती थी। अभिनव के पापा इन बातों को पसंद नहीं करते थे। वह कहते कि पुराने लोगों की बातें उनके साथ खतम हो गयी हैं, आप अपनी सोच को बदल लो। लेकिन पढ़ लिखकर भी हमारी जडों में रूदिवादिता भरी ही है। पीढ़ी दर पीढ़ी कई बातें हमें घुट्टी में पिला दीं जाती हैं शायद !तभी तो बहु के लिए देसी घी की पंजीरी बनाकर नीरु साथ लाई थी। न मालूम आज की मॉडर्न बहू खाए या न खाए --लेकिन हमारे यहां डिलीवरी के बाद चालीस दिनों तक हर सुबह दूध के साथ पंजीरी खाई जाती है। देखें इन मान्यताओं को कितना मान मिल पता है अमेरिका में रहते बच्चों से ?खैर ,इसी ऊहा -पोह व विचारों की कडियों ने नीरु को सफर का पता ही नहीं चलने दिया ,वह लास- एंजिलिस पहुंचकर भी तरो- ताज़ा दिख रही थी। दूर से अभिनव को अपनी ओर आते देखकर माँ का चेहरा खिल उठा। उसे गले लगाते ही मानो सफर के चौबीस घंटे हवा में उड़ गये। माँ की आँखें छलछला आईं। ममता की पैनी नज़र ने भांप लिया कि दोनो थके- थके से लग रहे थे। अपने देश में तो ऐसे हाल में बहुएँ नखरे करती हैं कि काम नहीं होता , चला नहीं जाता। लेकिन बाहर वे नौकरी के साथ -साथ घर का भी पूरा काम स्वयम करती हैं।माँ के आजाने से उन दोनों को राहत मिली व घर का एकाकीपन भी दूर हुआ। नीरु के भीतर भी ममत्व का सागर उमड़ रहा था। वह बहू को हर तरह का आराम देने का प्रयत्न करती। अदा ने भी प्रसन्नचित्त हो माँ को बेबी नर्सरी दिखाई। जिसमें चार रंगों की सजावट थी। उसने बताया कि इसे 'रेइज़्ल -देज़ल'थीम कहते हैं। वैसे लडकी के होनेपर पिंक और लडके के होने पर ब्लू नर्सरी सजायी जाती है। बच्चा होने के पहले कोई दोस्त या रिश्तेदार 'बेबी- शावर 'या पार्टी देकर सब को बुलाकर बच्चे का सामान गिफ्ट करते हैं। इस सामान की लिस्ट रजिस्टर की जाती है। निमन्त्रण -पत्र पर स्टोर के नाम व सामान की लिस्ट उनकी कीमत के अनुसार दे दीं जाती है। जिस दोस्त ने जितनी कीमत का सामान उपहार में देना है, वे वहाँ से ले लेते हैं। ये स्टोर बच्चा होने पर उसी के अनुरूप सामान बदल भी देते हैं। नीरू को ये सब बातें दिलचस्प लगीं। 'बेबी शावर ' उसे गोद भराई के समानान्तर ही लगा।
नीरू की अनजानी हसरत पूरी हो ही गयी। वक़्त आने पर वह नन्हे आरव की दादी बनी । वह यह जानकार हैरान हुयी कि कार सीट के बिना आप बच्चे को अस्पताल से घर नहीं ले जा सकते। और अगर कार सीट ठीक नहीं लगी तो $५०० फाइन देना पड़ता है। यह अमेरिका का सख्त कानून है। हमारी तरह गोद में लेकर कार में नहीं बैठ सकते।

खैर---ढेरों फोन आ -जा रहे थे। नीरू का मन करे कि घर में बाजे बजें । खुसरे नाचें और लोग बधायी देनें आएं ।उसे स्वयम पर हंसी आ रही थी। आज वह अपनी सास जैसी हो रही थी। वैसे अभिनव के दोस्त व उनके परिवार फूल ,गुब्बारे व गिफ्ट लिए बधाई देने आ रहे थे। पर उसे सभी अपने याद आ रहे थे। परदेस में उनकी कमी बहुत खटक रही थी। वैसे इण्टरनेट पर सबको आरव की पिक्चर्स भेज दीं गईँ थीं।
सुबह सबके उठने से पहले ही नीरू किचन का काफी काम निपटा लेती थी। अभिनव तैयार होकर ही कमरे से बाहर निकलता और बिना कुछ खाए पीये ही ऑफिस चला जाता था। माँ का दिल रो उठता, लेकिन उसे अब ऎसी ही आदत हो गयी थी। वैसे रात को गरमा -गरम खाना मिलने पर उसका चेहरा प्रफुल्लित हो उठता। इसीमें नीरू का मातृत्व सन्तुष्ट हो जाता। उस पल अभिनव के पापा को अकेले छोड़कर सात समुन्दर पार आना सार्थक हो जाता।एक दिन अदा ने पूछा " माँ! यह अफीस -टेबल खाने के कमरे में कैसा लगेगा? बेबी -नर्सरी में ठीक नहीं लग रहा है।" नीरू ने उसकी हाँ में हाँ मिला दीं। जब रात को अभिनव खाना खाने बैठा तो बिन बुलाए मेहमान की तरह आफीस -टेबल को खाने के कमरे में देखकर हैरान हो पूछ बैठा कि यह टेबल यहां क्या कर रहा है? छूटते ही अदा बोली ,"माँ ने कहा यहाँ अच्छा लगेगा । वहां आरव की नर्सरी में जगह कम है।"तभी अभिनव ग़ुस्से से बोला ,"माँ! आप चैन से क्यों नहीं बैठ सकतीं?"नीरू के चहरे पर एक रंग आ रहा था, एक जा रहा था। हकीकत बताने को नीरू मुँह खोलने ही लगी थी, कि देखा बेटा खाना खा रहा है। कहीं खाना बीच में ही ना रह जाए , यह सोच कर वह चुप ही रही।सोचा कोई बात नहीं। अदा ने उसकी आड़ लेकर अपने मन की बात कर ली। उधर मौके का फायदा उठाकर अदा दुगने जोश से पूछने लगी , " अईस्क्रीम विथ केक चलेगी ना!" उस रात नीरू अदा की चालाकी पर सोचती बेचैन रही. ठीक से सो नहीं पाई ।
अदा कमरे की दीवारों के भीतर ही आरव को नहला- धुला कर ,दूध पिलाकर सुला देती। नीरु आरव को गोद में लेने के सपने संजोती रह जाती। बंद कमरे को खटखटाना तो वैसे ही अदा को पसंद नहीं था। भीतर से आरव के रोने की आवाजें आने पर नीरु तड़प जाती थी।अदा के बदले हुए व्यवहार एवम बेरुखी से उसे इस घर में अपनापन नहीं महसूस होता था। अदा अधिकतर कमरा बंद ही रखती। नीरु कहती कि तुम नहा धो लो मैं आरव को संभालती हूँ, लेकिन वह उसे सुलाकर ही नहाती। शाम को अभिनव के घर आते ही उसे थमा देती कि अब तुम अपने हिस्से का संभालो। तब वह माँ को पकडा देता। आरव को बांहों में लेते ही नीरू का रोम-रोम खिल उठता। होंठों से मातृत्व लोरियों के रुप में प्रस्फुटित होने लगता। माँ के इस रुप को देख अभिनव मन्द-मन्द मुस्काता। सारे दिन में बस यही कुछ पल नीरू को पोता खिलाने के मिलते थे। रात को बिस्तर पर अकेली पडी नीरू सोचती कि उसका मन यहां बिल्कुल नहीं लग रहा, फिर भी पुत्र के मोह की मारी यहां पडी है। दुःख का कारण मोह- ममता ही तो हैं। उसे अपनी भावनाओं पर अंकुश रखना होगा। यहाँ के लोगों का रहन- सहन व उनकी सोच हम से भिन्न है।
नीरू जिस दिन अमेरिका पहुंची थी , उसी दिन अदा ने जो तौलिया उसे नहाने के लिए दिया था, वह पुराना घिसा हुआ किनारे से फटा हुआ था। पहले तो नीरू दूसरा तौलिया मांगने लगी, फिर कुछ सोचकर उसने उसी से नहा लिया । अगले दिन दूसरा फ्रेश तौलिया मांगने पर अदा ने कहा कि रात को धुलने के बाद सुबह आपको यही मिल जाएगा। नीरू ने सरलता से कहा कि घर में मेहमान को हमेशा अच्छा तौलिया देते हैं। जैसे आपके हैं,घिसा हुआ नहीं देते। तभी अदा तपाक से बोली थी, कि वे तो घर की हैं । मेहमान थोड़े ही हैं। तब नीरू उसकी फुर्ती व हाजिरजवाबी की कायल होकर रह गयी थी। वह तभी बाहर लॉन में जाकर बैठ गयी थी। उसे लगा था --धूप कुछ गीली सी हो गई है। मन पर हल्का सा बोझ आ गया था। अदा की शौपिंग की लिस्ट इतनी लम्बी थी कि उसकी भरपाई उसे अपना तौलिया निकालकर करनी पडी थी। अब ५० पौंड के अटैची में कितना कुछ समां सकता है। खैर , इतनी छोटी सी बात पर मूड क्या खराब करना। यह सोचकर वह नार्मल हो गयी थी।-
छोटीछोटी-बातें होती ही रहतीं ,लेकिन नीरू अभिनव को कभी कुछ नहीं कहती थी। एक दिन नीरू ने अपना एक सूट हाथ से धो लिया, क्योंकि उसका रंग निकलता था। बाहर सूखने डालने को ले जाते हुए लिविंग रूम के कालीन पर कुछ बूँदें पानी की टपक गईँ। सामने सोफे पर बैठी अदा जोर से चिल्ला उठी, "क्या करतीं हैं आप? पता नहीं लगता , सारा कारपेट खराब हो गया है। यह कोई इन्डिया है?"अभिनव भी पास बैठा कुछ पढ़ रहा था। माँ का चेहरा देखते ही वह सकपका गया। बोला कि कोई बात नहीं , आराम से बात करो। पर माँ के अहम् को ठेस लगी थी। वह बाहर धूप में सूट डालने के बाद वहीं पेड के नीचे जाकर बैठी रही। उसकी मन की चोट आंखों की कोरों से आज फिर बह निकली थी। गीली कोरों से सब ओर धुंधला दिखाई दे रहा था। वह अपने घर के आंगन की यादों के घेरे में लिपटी , सांझ का धुंधलका छाने तक वहीं बैठी रह गई थी।
कई -कई बार नीरू खाना नहीं खाती थी, पर उन दोनों को पता नहीं चलता था। अब तो अदा की हरकतें असह्य होती जा रही थीं। वह गाजर- मटर की सब्जी बनाने लगी तो , अदा ने उसके सामने से गाजरें उठा कर फ्रिज में रख दीं , केवल दो गाजरें देकर कहा कि केवल अपने लिए बना लो बस , हम नहीं खाएंगे। नीरू को लगा उसके दिल में दर्द हो रहा है। अदा से उसे ऐसा व्यवहार कभी भी आपेक्षित नहीं था। उसने कुछ भी नहीं बनाया। एक केला खा लिया। देखती क्या है कि अदा फ्रीज़र से सामान निकालकर बर्गर बना रही है। साथ में सूप का टिन काटकर --सूप गरम कर के ले रही है। अधिकतर अब वह ऐसा ही करती। कभी पास्ता, कभी चाईनीस .कभी सैंडविच बनाती व स्वयम ही खा जाती। वह जानती थी कि नीरू माडर्न है, सब कुछ खाती है। पर उसने कभी ओप चारिकता निभाने को भी नीरू को खाने को नहीं पूछा था। अब ऐसे माहौल में तो किसीका भी रहना मुश्किल है। सो, नीरू का भी अब और ठहरना मुमकिन नहीं था। वैसे वह अपने पति व बेटी को फोन पर यही कहती कि उसका मन ख़ूब लग गया है। इतने ढ़ेर सारे पैसे खर्च करके वह इतनी दूर बच्चों की मदद के लिए आई थी। किस मुँह से वह जल्दी वापस जाए? उसने देखा कि ये लडकियां बहुत चुस्त हैं। इन्हें मदद की ज़रूरत नहीं है। ये पति से पूरा काम करवा लेतीं हैं। यहाँ का कल्चर उन्हें यही सिखाता है कि बच्चा दोनों की बराबर जिम्मेवारी है। जबकि यह कल्चर यहाँ बहु - विवाह के कारण पनपा है।
सारा-सारा दिन घर में अपनी सोच को अपनी सखी- सहेली बनाकर अकेले पडे रहना वा बहु का बंद दरवाजा देखते रहना ---आखीर ऐसे कैसे वक़्त कट सकता है?अदा तो भीतर टेलीविज़न पर अपने पसंद के प्रोगाम देखती रहती थी। नीरू को इनके प्रोग्राम्स नहीं भाते थे। उसने सोचा बहुत हो गयी। उसने अभिनव से कहा कि उसका मन नहीं लग रहा वह अब वापस जाएगी। सुनते ही अदा बोली ,"मेरी ममी अगले महीने आ रही हैं। कुछ दिन हम मैनेज कर लेंगे। आप माँ की टिकेट करा ही दो।"नीरू ने राहत की सांस ली। अपने अन्तस में बहते ममत्व के झरने पर उसने बाँध लगा लिया।अभिनव ने सोचा कि अब माँ को थोडा घुमा दिया जाए, व शोपिंग करा दीं जाए। अगले ही दिन शनीवार था। वह माँ को होलीवुड साईन एवं होलीवुड down -town घुमाने ले गया । वहाँ से गलेरिया माल से शोपिंग करके बर्र बैंक एल. ए. के पी.जीं .चिंग से चाय्नीज़ फ़ूड खाकर शाम को घर लौटे। आते ही अदा उन पर बरस पडी ,"तुम्हे फालतू के कामों के बीच ध्यान ही नहीं रहता कि अपना बच्चा कितना रो रहा होगा। हद है तुम्हारी लापरवाही की। "सुनते ही अभिनव दोषी महसूसने लगा। अदा ने तो खैर क्या पूछना था कि कहाँ रहे या क्या लाए? जैसे कोई मतलब ही नहीं। नीरू सामान लेकर कमरे में जाकर धम्म से बैठ गयी।आदर ना सही ,तिरस्कार सहय नहीं हो पाता किसी से भी। उसने सोच लिया कि बच्चों का प्यार मृग मरीचिका है , इसके छल से बचना ही होगा। दो दिनों बाद दिल्ली के एयर-पोर्ट पर अभिनव के पापा ने उसका निस्तेज चेहरा देखा , कुछ नहीं बोले। मुस्करा कर उसका स्वागत किया। 'ज़रा रुकना" कहकर नीरू ने अपने पर्स से पासपोर्ट निकालकर उसे फाड़कर पास पडे कूदा दान में फेंक दिया। और मुस्कराती हुई उनके साथ होली। वे भी मन्द- मन्द मुस्कुराते हुए उसके आवेग को शांत व स्थिर होते हुए देख रहे थे।

मृग मरीचिका (पार्ट २ ऑफ़ ३)

नीरू की अनजानी हसरत पूरी हो ही गयी। वक़्त आने पर वह नन्हे आरव की दादीथाथ्थात बनी कार सीट के आप बच्चे को अस्पताल से घर नहीं ले जा सकते। और अगर कार सीट ठीक नहीं लगी तो $५०० फाइन देना पड़ता है। यह अमेरिका का सख्त कानून है। हमारी तरह गोद में लेकर कार में नहीं बैठ सकते। ढेरों फोन आ-जा रहे थे। नीरू का मन करे कि घर में बाजे बजें । खुसरे नाचें और लोग बधायी देनें आएं ।उसे स्वयम पर हंसी आ रही थी। आज वह अपनी सास जैसी हो रही थी। वैसे अभिनव के दोस्त व उनके परिवार फूल ,गुब्बारे व aलेकर बधाई देने आ रहे थे। पर उसे सभी अपने याद आ रहे थे। परदेस में उनकी कमी बहुत खटक रही थी। वैसे इण्टरनेट पर सबको आरव की पिक्चर्स भेज दीं गईँ थीं।
सुबह सबके उठने से पहले ही नीरू किचन का काफी काम निपटा लेती थी। अभिनव तैयार होकर ही कमरे से बाहर निकलता और बिना कुछ खाए पीये ही ऑफिस चला जाता था। माँ का दिल रो उठता, लेकिन उसे अब ऎसी ही आदत हो गयी थी। वैसे रात को गरमा -गरम खाना मिलने पर उसका चेहरा प्रफुल्लित हो उठता। इसीमें नीरू का मातृत्व सन्तुष्ट हो जाता। उस पल अभिनव के पापा को अकेले छोड़कर सात समुन्दर पार आना सार्थक हो जाता।एक दिन अदा ने पूछा " माँ! यह अफीस -टेबल खाने के कमरे में कैसा लगेगा? बेबी -नर्सरी में ठीक नहीं लग रहा है।" नीरू ने उसकी हाँ में हाँ मिला दीं। जब रात को अभिनव खाना खाने बैठा तो बिन बुलाए मेहमान की तरह आफीस -टेबल को खाने के कमरे में देखकर हैरान हो पूछ बैठा कि यह टेबल यहां क्या कर रहा है? छूटते ही अदा बोली ,"माँ ने कहा यहाँ अच्छा लगेगा । वहां आरव की नर्सरी में जगह कम है।"तभी अभिनव ग़ुस्से से बोला ,"माँ! आप चैन से क्यों नहीं बैठ सकतीं?"नीरू के चहरे पर एक रंग आ रहा था, एक जा रहा था। हकीकत बताने को नीरू मुँह खोलने ही लगी थी, कि देखा बेटा खाना खा रहा है. कहीं खाना बीच में ही ना रह जाए , यह सोच कर वह चुप ही रही. सोचा कोई बात नहीं . अदा ने उसकी आड़ लेकर अपने मन की बात कर ली. मौक़े का फायदा उठाकर अदा दुगने जोश से पूछने लगी , " अईस्क्रीम विथ केक चलेगी ना!" उस रात नीरू अदा की चालाकी पर सोचती बेचैन रही. ठीक से सो नहीं पाई . अदा कमरे की दीवारों के भीतर ही आरव को नहला- धुला कर ,दूध पिलाकर सुला देती। नीरु आरव को गोद में लेने के सपने संजोती रह जाती। बंद कमरे को खटखटाना तो वैसे ही अदा को पसंद नहीं था। भीतर से आरव के रोने की आवाजें आने पर नीरु तड़प जाती थी।अदा के बदले हुए व्यवहार एवम बेरुखी से उसे इस घर में अपनापन नहीं महसूस होता था। अदा अधिकतर कमरा बंद ही रखती। नीरु कहती कि तुम नहा धो लो मैं आरव को संभालती हूँ, लेकिन वह उसे सुलाकर ही नहाती। शाम को अभिनव के घर आते ही उसे थमा देती कि अब तुम अपने हिस्से का संभालो। तब वह माँ को पकडा देता। आरव को बांहों में लेते ही नीरू का रोम-रोम खिल उठता। होंठों से मातृत्व लोरियों के रुप में प्रस्फुटित होने लगता। माँ के इस रुप को देख अभिनव मन्द-मन्द मुस्काता। सारे दिन में बस यही कुछ पल नीरू को पोता खिलाने के मिलते थे। रात को बिस्तर पर अकेली पडी नीरू सोचती कि उसका मन यहां बिल्कुल नहीं लग रहा, फिर भी पुत्र के मोह की मारी यहां पडी है। दुःख का कारण मोह- ममता ही तो हैं। उसे अपनी भावनाओं पर अंकुश रखना होगा। यहाँ के लोगों का रहन- सहन व उनकी सोच हम से भिन्न है।

Wednesday, July 4, 2007

मृग मरिचीका (पार्ट १ ऑफ़ ३)

ममता का आवेग उसके भीतर हिलोरे ले रहा था , जिसके फलस्वरूप वह सातवें आसमान पर विचर रही थी। अपने बेटे अभिनव एवम बहू अदा के पास वह पहली बार अमेरिका आ रही थी। बहू के नौंवा महीना चल रहा था। कभी भी डिलीवरी हो सकती थी। हमारे इंडिया में तो लिंग टेस्ट करवाना निषेध v, लेकिन इन्होंने तो यहां होते हुए भी टेस्ट नहीं करवाया था। कहते हैं कि पहला बेबी है , कुछ भी चलेगा। आप दादा -दादी बन रहे हैं और हम माँ -बाप। फिर भी नीरु के मन में एक हसरत जन्म ले रही थी ।
काश! पुत्र हो जाए। फिर सोचा ,क्या उसकी सोच ठीक है ?उसने तो कभी बेटे -बेटी में फर्क नहीं समझा था। वह एक नए जमाने की स्त्री थी। तो क्या वह अतीत में चली गयी है ?अपनी बिन सिर -पैर की सोच पर उसे हंसी आ गयी। अपनी सास व माँ की उम्र की होते ही उसकी सोच भी वैसे ही चलने लगी थी शायद ! तभी तो वह भी मंगलवार को सिर धोने का साहस नहीं कर पाती, वृहस्पतिवार को घर में कपडे नहीं धुलने देती, व शनीवार को घर में - घी- तेल नहीं ला ने देती थी। अभिनव के पापा इन बातों को पसंद नहीं करते थे। वह कहते कि पुराने लोगों की बातें उनके साथ खतम हो गयी हैं, आप अपनी सोच को बदल लो। लेकिन पढ़ लिखकर भी हमारी जडों में रूदिवादिता भरी ही है। पीढ़ी दर पीढ़ी कई बातें हमें घुट्टी में पिला दीं जाती हैं शायद !तभी तो बहु के लिए देसी घी की पंजीरी बनाकर नीरु साथ लाई थी। न मालूम आज की मॉडर्न बहू खाए या न खाए --लेकिन हमारे यहां डिलीवरी के बाद चालीस दिनों तक हर सुबह दूध के साथ पंजीरी खाई जाती है। देखें इन मान्यताओं को कितना मान मिल पता है अमेरिका में रहते बच्चों से ?खैर ,इसी ऊहा -पोह व विचारों की कडियों ने नीरु को सफर का पता ही नहीं चलने दिया ,वह लास- एंजिलिस पहुंचकर भी तरो- ताज़ा दिख रही थी।
दूर से अभिनव को अपनी ओर आते देखकर माँ का चेहरा खिल उठा। उसे गले लगाते ही मानो सफर के चौबीस घंटे हवा में उड़ गये। माँ की आँखें छलछला आईं। ममता की पैनी नज़र ने भांप लिया कि दोनो थके- थके से लग रहे थे। अपने देश में तो ऐसे हाल में बहुएँ नखरे करती हैं कि काम नहीं होता , चला नहीं जाता। लेकिन बाहर वे नौकरी के साथ -साथ घर का भी पूरा काम स्वयम करती हैं।
माँ के आजाने से उन दोनों को राहत मिली व घर का एकाकीपन भी दूर हुआ। नीरु के भीतर भी ममत्व का सागर उमड़ रहा था। वह बहू को हर तरह का आराम देने का प्रयत्न करती। अदा ने भी प्रसन्नचित्त हो माँ को बेबी नर्सरी दिखाई। जिसमें चार रंगों की सजावट थी। उसने बताया कि इसे 'रेइज़्ल -देज़ल'थीम कहते हैं। वैसे लडकी के होनेपर पिंक और लडके के होने पर ब्लू नर्सरी सजायी जाती है। बच्चा होने के पहले कोई दोस्त या रिश्तेदार 'बेबी- शावर 'या पार्टी देकर सब को बुलाकर बच्चे का सामान गिफ्ट करते हैं। इस सामान की लिस्ट रजिस्टर की जाती है। निमन्त्रण -पत्र पर स्टोर के नाम व सामान की लिस्ट उनकी कीमत के अनुसार दे दीं जाती है। जिस दोस्त ने जितनी कीमत का सामान उपहार में देना है, वे वहाँ से ले लेते हैं। ये स्टोर बच्चा होने पर उसी के अनुरूप सामान बदल भी देते हैं। नीरू को ये सब बातें दिलचस्प लगीं। 'बेबी शावर ' उसे गोद भराई के समानान्तर ही लगा।

Tuesday, June 12, 2007

वीना विज -----परिचय

लाहौर में जन्मी वीना मैनी ने , प्रारम्भिक शिक्षा कटनी मध्यप्रदेश में व स्नाकोत्तर शिक्षा जबलपुर विश्वविद्यालय से प्राप्त की।एम् एड में विश्व विद्यालीय स्वर्ण -पदक प्राप्त किया। प्रारम्भ से ही भरत -naatyam नृत्य व नाटकों में गहन अभिरुचि होने से ढेरों ईनाम जीते।नैशनल कैडेट कोर में सीनियर मोस्ट अंडर आफीसर बनीं व मध्य प्रदेश को आल इंडिया में रीप्रसेंट किया।वहाँ बेस्ट कैडेट का खिताब जीता। विवाहोपरांत वीना विज बनी,व १९८३ से दूरदर्शन व आकाशवाणी जालंधर से जुड़ गईँ। कटनी में बाड्सले स्कूल एवं जालंधर में एपीजे स्कूल में भी कुछ समय के लिए अध्यापन कार्य किया।
सन् २००० तक ढेरों नाटकों ,टेली - फिल्मों , धारावाहिकों व कई पंजाबी फिल्मों में भी अभिनय किया। स्टार-प्लस व लिश्कारा चैनलों पर भी स्टार बेस्ट सैलर और ५२ किश्तों का धारावाहिक 'वापसी' किया।
यूं एस में अब वर्ष का आधा समय रहने के कारण सब छोड़ना पडा।
साहित्य की सेवा- स्वरूप कालेज के समय से ही कालेज- पत्रिका व समाचार- पत्रों में कवितायेँ लिखतीं रहीं। रंगमंच, आकाशवाणी व दूरदर्शन के साथ- साथ लेखन - कार्य भी चलता रहा। पंजाबी संस्कृति को सीखने का मौका मिलता रहा। आकाशवाणी जालंधर से अपनी आवाज में कविता- पाठ भी कई बार किया। सन् २००३ में ह्यूस्टन टेक्सास (यूं,एस) में कवि-सम्मेलन में वाहा-वाही मिली।
कादम्बिनी, समय-सुरभि (बिहार) , डैमोक्रेटिक वर्ल्ड एवं पंजाब केसरी (पंजाब )जगमग दीप ज्योति (राज स्थान) , देवदूत (महाराष्ट्र ) , दैनिक भास्कर (पं ,चंडीगढ़ ) इसके अलावा अंतर्जाल पर भी अभिव्यक्ति और अनुभूति (दुबई) , साहित्य कुञ्ज (कैनेडा ) , ई-कविता (न्यूयार्क ) , कृत्या (त्रिवेन्द्रम ) में भी इनकी कवितायेँ व कहानियाँ यदा- कदा पढी जा सकतीं हैं।
सन् १९९९ में प्रथम काव्य संग्रह ' सन्नाटों के पहरेदार ' छपा।
सन् २००४ में प्रथम कहानी संग्रह 'पिघलती शिला ' आथार्स गिल्ड आफ इन्डिया के सहयोग से छपी।
वैब साईट --- .veenavij.com
ई-मेल ------

Sunday, June 10, 2007

अहम् की तिलांजलि

हर बात पर बहस -हर चर्चा पर लडाई बस यही होता था , जब भी होता था देव और वन्या छोटी से छोटी बात पर भी बहसने के मुद्दे पर पहुंच ही जाते थे दोनो चाहते थे कि आपस में कोई टोपिक ना ही शुरू हो लेकिन पति-पत्नी ने आखिरकार रहना तो साथ ही था न ! सारी उम्र इकट्ठी काटी थी, वो बात और है -समझौतों के दामन में तो फिर अब --------?एक ही घर में रहते हुए , एक कमरे में रहने पर भी कोफ़्त होती थी बच्चे तो दोनो चले गये थे बेटा नौकरी पर तो बेटी अपने ससुराल रह गए थे बस --मियाँ और बीवी।
एक ही बेडरूम में आखीर क्यों एक दूसरे के खर्राटों को सुनकर नींद खराब की जाये ,इसलिए अलग -अलग बेडरूम में सोने का चलन हो गया था अब वैसे भी ढलती उम्र में किसी एक के करवट लेने से यदि दूसरे की नींद भी उखड़ जाती थी , तो फिर उसकी रात आंखों में कटती थी व अगली सुबह एक -दूसरे का मुँह भी ना देखनेवाला हाल होता थासुबह का आगाज मनहूसियत से हो तो दिन कैसा होता होगा , यह तो वही समझ सकता है जो कभी ऐसे हालात से दो - चार हुआ हो ..
वे दोनो स्वयं हैरान थे कि कभी वे भी एक दूसरे के दीवाने व प्रेमी थे उम्र ढलने के साथ - साथ आखीर इतना बदलाव व बेरुखी कैसे? वन्या स्वयं को दोषी मानती थी उसने सारी उम्र सम्पूर्ण समर्पण की राह अपनाई रही तभी तो उनका प्रेम रहा कहीं भी अवरोध आड़े आता , तो तभी वही दीवानगी -बेरुखी बन जाती थी पुरुष का अहम् सदा कायम रहाऔर उसकी छत्र छाया में सहमा हुआ प्रेम पनपता रहा देव आज दावा करता है कि वह इन परिस्थितियों से जूझ कर थक चुका है उसकी सहन -शक्ति की सीमा अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुकी है और साथ - साथ नहीं जीया जा सकता है यह सुनते ही वन्या टूटकर बिखर जाती । वन्या जितनी भावुक व संवेदनशील थी , देव उतना ही व्यवहारिक अपितु धैर्यवान था।हर पल , हर घड़ी वन्या की कोशिश रहती कि वह देव की इच्छानुरूप ही हर कार्य को अंजाम दे ।फिर भी न जाने कब कहाँ चूक हो जाती और देव का मुँह बन जाता ।
वन्या इस अधूरेपन में पूर्णता खोजती रहती । उसे लगता यदि वह अपूर्ण है , उसमें कमियां हैं तो देव में भी कम खामियां नहीं हैं। अंतत: हम सब अधूरे हैं। पूर्णता मात्र हमारी कल्पना है। जिन रिश्तों की दुहाई देते हम थकते नहीं , वही जब टूटते हैं ;और उनसे उलझे भावात्मक तन्तु सुलझ नहीं पाते तो वे त्रासदायी बन जाते हैं। सम्भावनाएं जन्म लेने लगती हैं। 'प्रेम जब अधिक बढ जाता है तो उसमें क्रोध रूपी घाव सरलता से पनपने लगता है'। (पति- पत्नी के बीच ) यह कहीं पढा था। कारण -------क्योंकि वे दोनो एक- दूसरे को फ़ॉर-graanted ले लेते हैं। कहीं कोई लिहाज या आदर नहीं रह जाता है । तभी वह घट जाता है , जो एक- दूसरे से आपेक्षित नहीं होता। वही पति - पत्नी चेतनाशून्य से , मशीन के पुर्जे की तरह जीने लग जाते हैं। इसी कारण वन्या के मस्तिष्क में भाँति- भाँति की शंकाएँ मंडराने लगतीं। ये सब बातें - उसे किसी भावी अनिष्ट की पूर्व - संकेत सी प्रतीत होतीं। हर दिन , हर पल की कसक को ही इस उम्र में उसने अपने जीवन की नियति स्वीकार कर लिया था। बेनाम सा दर्द उसके सीने में चुभन लिए जीं रहा था।
शादी के समय माँ का कहा वाक्य " अग्नि के चारों ओर फेरे लेते हुए , उस अग्नि में अपने अहम् की आहुति दे दोगी , तो जीवन की राह फूलों भरी हो जायेगी। पति व ससुराल को पूर्णतया पा लोगी। "----वन्या ने सदा उसी के अनुरूप जीवन जीया। सारी उम्र वह सबकी चहेती बनी रही। आज जीवन की घिरती संध्या में , जब सब चले गए और रह गये वे दोनों ---तो -तो फिर तकरार क्यों? क्या वन्या का अहम् आड़े आने लगा है?वह सदैव से पति की मानिनी बनी रही। उसके रंग में रंगी , उसके व्यक्तित्व का स्वरूप , उसकी परछाईं । आज यदि वह देव की किसी विचारधारा से असहमत होती है , तो देव को वह सहय नहीं होता । वह ग़ुस्से से आगबबूला हो उठता है। शायद यही individuality या वैयक्तिक विचारधारा है। असल में यही कारण है भिन्न होने का। प्रतिदिन की छोटी- छोटी बातें जैसे,--मैंने तौलिया कुर्सी पर रखा था , किसने उठाया? अभी दरवाजा बंद किया था -क्यों खोला? पायदान फिर से यहीं रख दिया --एक बात बार -बार क्यों बतानी पडती है? मेरे साइड- टेबल पर मेरे पेपर्स क्यों छेड़ते हो?समय पर कुछ नहीं मिलता है। इस कमरे में पर्दे नहीं लगाने , टी.वी पर सीरियल नहीं लगाना वगैरह -वगैरह। हर घर के टूटने में यही छोटी -छोटी बातें पहाड़ का स्वरूप ले लेती हैं। यही कुछ तो वन्या के साथ भी घट रहा था । छोटी सी बात पर हिटलर सा व्यवहार उसके अंतस को कचोट जाता । रिटायर्ड होने पर सारा दिन घर बैठकर मीन मेख निकालना व घर में दहशत का वातावरण बिखेरे रखना न जाने पुरुषों के अहम को कहाँ तक सन्तुष्ट करता है ---वह समझ नहीं पाती ।
"में न आर फरोम मार्स , वीमेन आर फ्रॉम वीनस "....जॉन ग्रे की पुस्तक स्त्री - पुरुष के आपसी संबंधों को समझाने की सफल कुंजी है। वन्या ने बहुत चाहा कि देव फुर्सत के क्षणों में इसे पढ़ ले। लेकिन वह देव को कभी भी इस के लिए मना नहीं पायी थी। देव को ऎसी बातें बेतुकी लगती थीं। किसी एक पुरुष के विचारों को देव अपने ऊपर लाद ले ; यह उसके अहम को गंवारा नहीं था । वन्या हतोत्साहित होकर रह जाती। वन्या सोशल थी । उसे लोगों से मिलना - जुलना भाता था। वहीं देव अब इस उम्र में इसके अपवाद बन चुके थे। ओशो की विचारधारा के अनुरूप वन्या हर पल में ख़ुशी तलाशने की चेष्टा करती , क्योंकि वह पल जीवन में दोबारा नहीं आएगा । दीपक चोपडा की पुस्तकें भी उसके कमरे की शोभा थीं --जिनको पढ़कर आशावादी दृष्टिकोण अपनाना व हर बात में सकारात्मक प्रवृति बनाए रखना , उसने अपना ध्येय बना लिया था। अपने अहम् को तिलांजली देने से ही , पुन: सुख संभव था --------वन्या यह समझ गयी थी। पहल कोई भी करे। जबकि पहल वन्या ही करती । वह कोई न कोई बात कर के देव का मूड ठीक करने की गरज से चुप्पी तोड़ देती थी । देव को बात कर ने पर विवश कर देती थी। इससे पिछले गिले धुल जाते , व जीवन फिर उसी पटरी पर चल पडता था। जिन पति -पत्नी में बातें खुलती नहीं , वहाँ रिश्ते चुप्पी के सन्नाटे के नाद से चटक कर टूट जाते हैं। इसमें उम्र की कोई लकीर नहीं रहती। नए-ब्याहे जोडे से लेकर हर उम्र में अहम् की लड़ाई ही सर्वोपरी है। वहाँ अलगाव या तलाक की नौबत आ जाती है।
देव के दोस्त मि, सिंग ..जो चंडीगढ़ हाई-कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं, उन्हें एक बार मिलने आए। वे बता रहे थे कि पचास से ऊपर की उम्र में तलाक के केसेस बहुत बढ़ गए हैं। हैरानी की बात है। तब ये दोनों भी एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। वन्या तो ऊपर से नीचे तक सिहर उठी थी , यह सुनकर। वह तो आज तक यही सुनती आ रही थी कि ढलती उम्र में भी लोग एक-दूसरे का साथ पाने के लिए शादी करते हैं। एकाकीपन में जीवन बिताना कठिन होता है। पति-पत्नी एक-दूसरे के सुख- दुःख के सच्चे साथी होते हैं। क्या शारीरिक संबंध का ढलती उम्र में कम होना, या समाप्त होना क्षोभ का कारण तो नहीं? पुरुष का अहम् इससे खीझ में तो नहीं परिवर्तित हो जाता? पढे- लिखों को तो यह काम्प्लेक्स नहीं होना चाहिए। बल्कि अपने आप को अन्यत्र व्यस्त रखना चाहिए ----वन्या का मानना था।
वन्या अपने कालेज के जमाने में नाटकों में हिस्सा लेती थी। नाटकों में हर उम्र के कलाकार चाहिए होते हैं, सो अपने को इन परिस्थितियों से उबारने के लिए उसने रंगमंच के एक ग्रुप को ज्वाईन कर लिया। शायद कला के प्रति समर्पित होकर वह चैन से जीं सके। देव समय पर उसे छोड़ जाते, व समय होने पर लेने भी पहुंच जाते। इस पर वह देव की कायल हो जाती। दूरी से ही शायद नज़दीकियाँ आ जाएँ---। हर सुबह सैर करने वे एक साथ जाते, लेकिन उनके बीच अहम की कोलतार की रोड होती , जिसके दोनों सिरों पर दो अनजान हमसफर चल रहे होते। कभी-कभार अहम् को स्वाहा करके वन्या ही रोजमर्रा की बातें करके माहौल को हल्का करने का यत्न करती। देव के बात करने पर वह मन ही मन अपनी सफलता पर मान करती। हलके- फुल्के माहौल में दोनों ही दोबारा संभलकर बात करने का मन ही मन प्रण करते।
आज वन्या को कुछ नहीं भा रहा था। भीतर ही भीतर कुछ टूट रहा था। वो रिहर्सल पर भी नहीं गयी। उसे लेने घर पर नाटक के साथी कभी कार तो कभी जीप में आये, उसने तबीयत खराब का बहाना बना दिया। सारा दिन देव उसे कनखियों से देखते शांत भाव से कभी अखबार लिए तो कभी फोन पर व्यस्त रहे। वह सारा दिन सोचती रही कि शायद देव उससे आकर उसका हाल पूछेगा, लेकिन ...... वह नहीं आया। वन्या की आँखें चुपचाप बरसती रहीं। रात को बत्ती बुझने पर अपने अहम् को तिलांजली देने में पहल करते हुये, वन्या धीरे से आकर देव की बगल में उसकी छाती से मुँह लगा कर लेट गयी। मानो बरसों से मरू में भटक रही थी , अब जाकर ठौर मिला हो। देव ने भी प्रत्युत्तर में उसे प्रेम - पाश में ले लिया। जीवन के सकारात्मक तन्तु उन्हें समीप ले आए थे।


वीना विज 'उदित'