Friday, July 6, 2007

मृग मरीचिका (पार्ट २ ऑफ़ ३)

नीरू की अनजानी हसरत पूरी हो ही गयी। वक़्त आने पर वह नन्हे आरव की दादीथाथ्थात बनी कार सीट के आप बच्चे को अस्पताल से घर नहीं ले जा सकते। और अगर कार सीट ठीक नहीं लगी तो $५०० फाइन देना पड़ता है। यह अमेरिका का सख्त कानून है। हमारी तरह गोद में लेकर कार में नहीं बैठ सकते। ढेरों फोन आ-जा रहे थे। नीरू का मन करे कि घर में बाजे बजें । खुसरे नाचें और लोग बधायी देनें आएं ।उसे स्वयम पर हंसी आ रही थी। आज वह अपनी सास जैसी हो रही थी। वैसे अभिनव के दोस्त व उनके परिवार फूल ,गुब्बारे व aलेकर बधाई देने आ रहे थे। पर उसे सभी अपने याद आ रहे थे। परदेस में उनकी कमी बहुत खटक रही थी। वैसे इण्टरनेट पर सबको आरव की पिक्चर्स भेज दीं गईँ थीं।
सुबह सबके उठने से पहले ही नीरू किचन का काफी काम निपटा लेती थी। अभिनव तैयार होकर ही कमरे से बाहर निकलता और बिना कुछ खाए पीये ही ऑफिस चला जाता था। माँ का दिल रो उठता, लेकिन उसे अब ऎसी ही आदत हो गयी थी। वैसे रात को गरमा -गरम खाना मिलने पर उसका चेहरा प्रफुल्लित हो उठता। इसीमें नीरू का मातृत्व सन्तुष्ट हो जाता। उस पल अभिनव के पापा को अकेले छोड़कर सात समुन्दर पार आना सार्थक हो जाता।एक दिन अदा ने पूछा " माँ! यह अफीस -टेबल खाने के कमरे में कैसा लगेगा? बेबी -नर्सरी में ठीक नहीं लग रहा है।" नीरू ने उसकी हाँ में हाँ मिला दीं। जब रात को अभिनव खाना खाने बैठा तो बिन बुलाए मेहमान की तरह आफीस -टेबल को खाने के कमरे में देखकर हैरान हो पूछ बैठा कि यह टेबल यहां क्या कर रहा है? छूटते ही अदा बोली ,"माँ ने कहा यहाँ अच्छा लगेगा । वहां आरव की नर्सरी में जगह कम है।"तभी अभिनव ग़ुस्से से बोला ,"माँ! आप चैन से क्यों नहीं बैठ सकतीं?"नीरू के चहरे पर एक रंग आ रहा था, एक जा रहा था। हकीकत बताने को नीरू मुँह खोलने ही लगी थी, कि देखा बेटा खाना खा रहा है. कहीं खाना बीच में ही ना रह जाए , यह सोच कर वह चुप ही रही. सोचा कोई बात नहीं . अदा ने उसकी आड़ लेकर अपने मन की बात कर ली. मौक़े का फायदा उठाकर अदा दुगने जोश से पूछने लगी , " अईस्क्रीम विथ केक चलेगी ना!" उस रात नीरू अदा की चालाकी पर सोचती बेचैन रही. ठीक से सो नहीं पाई . अदा कमरे की दीवारों के भीतर ही आरव को नहला- धुला कर ,दूध पिलाकर सुला देती। नीरु आरव को गोद में लेने के सपने संजोती रह जाती। बंद कमरे को खटखटाना तो वैसे ही अदा को पसंद नहीं था। भीतर से आरव के रोने की आवाजें आने पर नीरु तड़प जाती थी।अदा के बदले हुए व्यवहार एवम बेरुखी से उसे इस घर में अपनापन नहीं महसूस होता था। अदा अधिकतर कमरा बंद ही रखती। नीरु कहती कि तुम नहा धो लो मैं आरव को संभालती हूँ, लेकिन वह उसे सुलाकर ही नहाती। शाम को अभिनव के घर आते ही उसे थमा देती कि अब तुम अपने हिस्से का संभालो। तब वह माँ को पकडा देता। आरव को बांहों में लेते ही नीरू का रोम-रोम खिल उठता। होंठों से मातृत्व लोरियों के रुप में प्रस्फुटित होने लगता। माँ के इस रुप को देख अभिनव मन्द-मन्द मुस्काता। सारे दिन में बस यही कुछ पल नीरू को पोता खिलाने के मिलते थे। रात को बिस्तर पर अकेली पडी नीरू सोचती कि उसका मन यहां बिल्कुल नहीं लग रहा, फिर भी पुत्र के मोह की मारी यहां पडी है। दुःख का कारण मोह- ममता ही तो हैं। उसे अपनी भावनाओं पर अंकुश रखना होगा। यहाँ के लोगों का रहन- सहन व उनकी सोच हम से भिन्न है।

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